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मन की व्यथा |
आज फिर उन बातों को हवा दे गई
जिसे दवा रखा था हृदय के किसी कोने में
आज फिर उसे जगा गई
मन शांत, तन शिथिल, धड़कन तेज़ और
शिलाओं को क्षणभंगु का आभास करा गई
उनकी मार्ग-दर्शन को ज्ञातव्य न करने के लिए
मेरी उन्मुद चेतना सुला गई
सोचा करें शिकायत, पर निशा बीती
प्रभाकर आया और उनकी खुशियों
की कामनाएं दिल से निकल गई
मुरली मनोहर का इस तृण ने ध्यान किया
हो गगनचुम्बी पद उनकी यही अरमान किया
तृण की व्यथा से व्यापक, देवी उनको
रुब-रु करा गई
आज फिर उन बातों को हवा दे गई
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